Sagara Pran Talamalala (Marathi)


Sagara Pran Talamalala (Marathi)

सागरा प्राण तळमळला

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ने मजसी ने परत मातृभूमीला सागरा प्राण तळमळला ॥धृ॥

भूमातेच्या चरणतला तुज धूता मी नित्य पाहिला होता
मज वदलासी अन्य देशि चल जाऊ सृष्टिची विविधता पाहू
तैं जननीहृद् विरहशंकितहि झाले परि तुवां वचन तिज दिधले
मार्गज्ञ स्वये मीच पृष्ठि वाहीन त्वरित या परत आणीन
विश्वसलो या तव वचनी मी जगद्नुभवयोगे बनुनी मी
तव अधिक शक्ती उद्धरणी मी येईन त्वरे कथुनि सोडिले तिजला ॥

शुक पंजरि वा हरिण शिरावा पाशी ही फसगत झाली तैशी
भूविरह कसा सतत साहु या पुढती दशदिशा तमोमय होती
गुणसुमने मी वेचियली या भावे की तिने सुगंधा घ्यावे
जरि उद्धरणी व्यय न तिच्या हो साचा हा व्यर्थ भार विद्येचा
ती आम्रवृक्षवत्सलता रे नवकुसुमयुता त्या सुलता रे
तो बाल गुलाबहि आता रे फुलबाग मला हाय पारखा झाला ॥

नभि नक्षत्रे बहुत एक परि प्यारा मज भरतभूमिचा तारा
प्रासाद इथे भव्य परी मज भारी आईची झोपडी प्यारी
तिजवीण नको राज्य मज प्रिया साचा वनवास तिच्या जरि वनिचा
भुलविणे व्यर्थ हे आता रे बहु जिवलग गमते चित्ता रे
तुज सरित्पते जी सरिता रे त्वदविरहाची शपथ घालितो तुजला ॥

या फेनमिषें हससि निर्दया कैसा का वचन भंगिसी ऐसा
त्वत्स्वामित्वा सांप्रत जी मिरवीते भिनि का आंग्लभूमीते
मन्मातेला अबला म्हणुनि फसवीसी मज विवासनाते देशी
तरि आंग्लभूमी भयभीता रे अबला न माझि ही माता रे
कथिल हे अगस्तिस आता रे जो आचमनी एक क्षणी तुज प्याला ॥
Sagara Pran Talamalala (Marathi)
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