Jagaati Hach Khara Purusharth (Marathi)


Jagaati Hach Khara Purusharth (Marathi)

जगती हाच खरा पुरुषार्थ

--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

जगती हाच खरा पुरुषार्थ॥ध्रु॥

या शरिराच्या कणाकणातुन
वसे त्यागमय जिवंत जीवन
व्यवहारी ते दावी उजळुन
जगतो सेवेच्या श्वासावर होत असे पुरुषार्थ॥१॥

जगेल अवयव का शरिराविण
घटक जगे का समाज सोडुन
या तत्त्वाने जगतो जीवन
समाज सारा कुटुंब गणिले सोडुनिया निज स्वार्थ॥२॥

परिस्थितीच्या चक्रव्युहातुन
झुंजत असता भ्रमते जीवन
परि ध्रुवावर दृष्टी खिळवुन
अंकित करता स्थान यशाचे होते जीवन सार्थ॥३॥

संसाराचे पाश तोडले
सौख्याशेचे नाव सोडले
जीवनकार्यी विलीन केले
व्यक्तित्वाला पार विसरलो केवळ राष्ट्रहितार्थ॥४॥

परि सत्त्वाचे तेज न साहुन
उफाळले खळ हे अपवाद न
रामहि गेले वनवासातुन
ग्रहण लागले सूर्यासम तरि साधियला परमार्थ॥५॥

एक वेळ रवि होइल शीतल
होइल अणुसम भव्य हिमाचल
राहणार परि आम्ही निश्चल सत्य असे साह्यार्थ॥६॥
Jagaati Hach Khara Purusharth (Marathi)
Jagaati Hach Khara Purusharth (Marathi)

Post a comment

0 Comments